आज ज्यादातर अखबारों में छपा है कि ठंडक से अब तक १६८ लोग मर चुके है ....पर ऐसा क्यों हुआ .क्या ये लोग जंगले में रह रहे थे या फिर अभी भी भारत के लोग गुलाम है जो शासक हमारे ऊपर धयान नही देते है .........या फिर हम जानवरों कि तरह इतनी जनसँख्या बढ़ाते चले जा रहे है कि कौन मर और कौन जिन्दा ..इसका कोई मूल्य ही नही रहा .......वसुधैव कुतुम्बुकम का नारा देने वाले देश में उसी के लोग मर रहे है .......क्या अनेकता में एकता का मतलब यह तो नही ..............कि हम भारतवासी तो है पर उनके जीवन में क्या हो रहा है उस से मतलब नही है ...........हम भारत ले लोग है या फिर एक देश में रहने वाले भाई बहन .......इस देश कि नातेदारी के तो क्या कहने ..............पर आज सड़क पर मर रहे लोग क्या मंगल गृह के लोग है .....हम अपनी पार्टी को जितने के लिए पूरे शहर को होर्डिंग से पाट देते है .पर उन्ही होर्डिंग्स के पैसे इतनी ठंडक में गरीबो को कम्बल नही बाट पाए .........लोक पल के लिए लोग चंदा इक्कट्ठा करते मिल जायेंगे पर गरीबो के लिए कम्बल नही खरीद नही पाए ......यह कैसा भारत है जहा आकाश कि तरह दिखाई तो नीला देता है .पर जैसे आकाश जैसी कोई चीज़ नही है और सिर्फ कालापन है.वैसे ही हमारे हाथो में भी शुन्य ही है ......पर हम दिखाना कुछ और चाहते है .अखिल भारतीय अधिकार संगठन
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