Wednesday, December 21, 2011

अन्ना आज बंगलुरु में लोकायुक्त  के लिए जनसभा कर रहे है ..........पर यह सब करके हम क्या पाने जा रहे है ...........एक जन सुचना अधिकार अधिनियम २००५ पाकर हम निहाल हो गए है .दूसरा जन लको पल पाकर हो जायेंगे ..........ऐसा नही कि मै नही चाहता पर सिर्फ कानून लेन का फाएदा.........आप में से कितनो ने उत्तर प्रदेश के सुचना आयोग में नियुक्त होने वाले सूचना आयुक्त के बारे में जान ना  चाहा............कितनो को मालूम है कि योग में सूचना मांगने के लिए वाद दायर करने के बाद अब २-३ साल लग जाते है .क्या आयुक्त को सूचना के लिए इतना समय लगाने का अधिकार प्राप्त है .............क्या पूरे अधिनियम में खी इतने दिन तक वाद चलने का अधिकार आयुक्त को मिला है .............नही .......क्या अन्ना जी यह भरष्टाचार नही है ...........धारा १९ के अनुसार और १९(३) के अनुसार हमें साडी सूचना अधिकतम १०० दिन में मिल जनि चाहिए ..पर क्या ऐसा होता है ...............यही नही कोल्कता उच्चा न्यायालय ने २०१० में अपने एक निर्णय में खा था कि जिस दिन आयोग में केस दाखिल हो उस दिन से अधिकतम ४५ दिन में वादी को सूचना मिल जानी चाहिए ............यही नही धारा २०(!) और २०(२) में कितने लोगो से जुरमाना वसूला गया या फिर उनकी सेवा पुस्तिका पर नकारात्मक टिप्पड़ी की गयी .............कोई जनता है ............क्या अन्ना जी यह भर्ष्टाचार नही है .............धारा १७ में अब तक माननिये राज्य पाल महोदय के यहा १२८ शिकायत सूचना आयुक्तों के खिलाफ की गई पर बताया गया की सरो शिकायतों का निस्तारण हो चूका है ...........यानि जनता ने जो शिकायत की थी वो झूठी थी ,तभी तो कोई सूचना आयुक्त नही हटाया गया ...........जनता का मूल्य क्या है अन्ना जी ...........सिर्फ आपको सुन ना ही जनता नही हो सकता .उसकी गरिमा के लिए क्या हो रहा है .............क्या ऐसे ही जान लोक पाल के लिए आप जनता का आवाहन कर रहे है ............जहा अनशन करिओ को बेकार दवा खिला कर मरने की कोशिश की जाती है ,,,,,,,,,,,,जहा सरकारी नौकरी करने वाले नौकरी छोड़ कर झूले लाल पार्क में दीखते है .........क्या सरकारी नौकरी वाले इसे कर सकते है ...........क्या इसे सर्कार विरोधी नही खा जा सकता ..............क्या कोई भी अपने को डॉक्टर कह कर मंच में बैठे लोगो का इलाज कर सकता है ......................भारत की जनता को अगर सोचना है तो दिल से नही दिमाग से सोचिये कि कानूनों के ढेर पर बैठ कर हमने आज तक कौन गरिमा माये जीवन पा लिया .............दहेज़ का कानून , घरेलू हिंसा  क्या नही है कानून में पर भारत कि औरत कहा है ............सब को मालूम है .....कौन लोक पाल इनको सुनेगा ..................लखनऊ के परिवार न्यालय में ज्यादातर नयायाधीश महोदय की नियुक्ति ही नही रहती ......एक औरत न्याय के आस में घुट घुट कर दम तोड़ देती है .............कौन लोक पाल उन्हें पारदर्शिता देगा ...................क्या ये सन मेरी हताशा है .......या फिर एक भारत का सच जहा जनता सिर्फ कुछ लोगो की कठपुतली है जो जनता के नाम पर खुद एक नाम हो जाते है ..जागो भारत जागो

No comments:

Post a Comment