Wednesday, December 21, 2011

एक रोटी की दरकार थी मुझे जिस्म के लिए ,
उन्हें जिस्म की ही दरकार है एक रोटी के लिए .........
बुरा भी नही लगता बच्चो का यू ही नंगा रहना
पर अब तो बड़े भी बच्चे बन कर रहने लगे है ......
उन्हें हक़ भी था देश को अपना कह कर जीने का ,
पर अब तो हर चौराहे पर खड़े है खरीदने के लिए ............
मै तो आलोक बन कर महका उनके अंधेरो में ,
पर अब गली में खुल गई है खिड़की समेटने के लिए ..........
ऐसी न जाने कितनी पंक्तिया मेरे दिल में उठती है और हार हर बैठ जाती है .क्यों कि हम सब न जाने क्यों सो रहे है ............ज्यादातर लोग यही मानते मिलने लगे है कि आपके पास कोई काम नही है इस लिए आप ऐसी बात करने लगे है .....एक बार बैठ कर सोचिये तो आज से २५ साल पहले जब एक अनपढ़ चोरी करता था तो समझ में आता था कि वो गरीब है .पर जब आज अपढ़ लिखे ही चोर होने लगे तो लगता है कि यह हमने कैसी तरक्की पाई ...यही नही हमारे देश में स्वतंत्रता के समय जनजाति समूहों कि संख्या २१२ थी जो अब बढ़ कर ६९८ हो गयी है ........तो यह देश का कैसा विकास हुआ है ..................आज हम १०० रुपये में सही खाना नही खा सकते जबकि इसी देश में कभी सैकड़ापति कहलाते थे वह आज लखपति का जीना मुश्किल है .....जिस देश में एक रेल दुर्घटना होने पर श्री लाल बहादुर शास्त्री इस्तीफा दे देते थे ..उसी देश में हर नेता गंभीर आरोप लगने पर भी कुर्सी से चिपके रहना चाहता है ..........यह किस तरह के मूल्यों का विकास हुआ है .पहले गाँव, मोहल्ला कि लड़की , लड़का  भाई बहन हुआ करते थे .वही इस देश में दहेज़, बलत्कार से लड़की पीडित होती रहती है और हम चुप चाप देखते  रहते है .यह मनुष्यता कि कौन सी पशुता है ..........यानि कुल मिला कर हमने सामाजिक जानवर बन कर रहना ही बेहतर समझा है .....अखिल भारतीय अधिकार संगठन आप से निवेदन करता है .....कि एक बार तो सोचिये कि अगर हम सब नही  रुके तो क्या हम अपनी अगली पीढ़ी के लिए छोड़ेंगे ..जय माँ

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